नानक दुखिया सब संसार ! (बोध कथा)

आपको इस कोने में बैठे-बैठे सारा दिन कैसे निकलता है मां!


पुजारी जी ने मन्दिर का थोड़ा-सा प्रसाद एक बूढ़ी और बीमार महिला को देते हुए पूछा।


उसने प्रसाद हाथ में ले लिया और थोड़ा रूककर भर्राये गले से कहा, फिर कहां जाऊं पुजारी जी। आप ही बताएं।'


नहीं , नहीं। मैं तो इसलिए पूछ रहा था कि आप कभी भी भीख नहीं मांगती। बस चुपचाप आसन पर बैठी रहती हैं और ठीक पांच बजे वापस लौट जाती है।'


आंखों मैं आंसू भर उस वृद्धा ने बताया कि इस महानगर में लोग अजनबी पर ही नहीं अपनों पर भी अविश्वास कर बैठते हैं। मेरे बेटे-बहु सुबह नौ बजे अपने फ्लैट में ताला लगाकर मुझे घर से बाहर कर देते हैं और फिर शाम को उनके वापस आने तक मुझे यहीं मन्दिर के कोने में गुजारना पड़ता है और ऐसी कौन-सी जगह होगी पुजारी जी जहां प्रसाद पानी और साथ में थोड़ी सहानुभूति भी मुफ्त में मिल जाती हो?


अपनी बात पूरी करके वृद्धा ने आंचल से आंसू पोंछ लिए। सुनकर स्वयं पुजारी जी की आंखें नम हो गई।


वे भले ही काॅलोनी में बड़े ही सम्मानित वृद्ध थे, पर उनके घर में उनसे भी यही उम्मीद की जाती थी कि वे ज्यादातर अपनी शक्ल बाहर वालों को ही दिखाए और धर्मशाला की भांति सिर्फ रात्रि शयन के लिए घर पर आएं। पुजारी जी उस वृद्धा को सांत्वना देकर वापस मन्दिर की सीढ़ियां चढ़ ही रहे थे कि किसी प्रभू भक्त के मोबाइल की रिंगटोन बज उठी नानक दुखिया सब संसार।'