मैं पूजा का पात्र क्यों ? (प्रेरक कथा)

एक रात को जब पुजारी मंदिर का द्वार बंद कर चला गया तो देवमूर्ति बने बैठे पाषाण से, स्तंभ के पाषाण ने पूछा-"क्यों भाई! हम सब एक ही पर्वत पर से चुनकर यहाँ लाए गए हैं। फिर तुम्हें ही यह पूज्य पद क्यों मिला? जबकि मैं छत का बोझ सहने को स्तंभ बना हुआ हूँ।"


देवता के आसन पर प्रतिष्ठित पाषाण कुछ विचारकर बोला-"बंधु! मैं स्वयं इस रहस्य को नहीं जानता। कल मंदिर के पुजारी से पूछूगा।"


अगले दिन जब पुजारी अर्चना के अनंतर हाथ जोड़कर विनय मुद्रा में खड़ा हो गया तो देव पाषाण बोला- "विद्वान पुजारी! मंदिर में जितने भी प्रस्तर हैं, वे सभी समान गुण-जाति के हैं, फिर मैं ही पूजा का पात्र कैसे बन गया?" क्या यह रहस्य समझा सकोगे?"


“आपने बड़े महत्त्व की बात पूछी है भगवन्!" पुजारी बड़े ही विनम्र वचनों में बोला--


"एक गुण धर्म तथा जाति की सभी वस्तुओं का उपयोग एकपद ही हो यह सर्वथा असंभव है। प्रकृति किसी को भी समान रूप से रहने देना नहीं चाहती। हम मनुष्यों में भी ऐसा ही होता है। बहुत से मनुष्य समान प्रतिभा तथा जाति, गुण के होते हैं, परंतु उनमें से अपने श्रेष्ठ कर्मों के कारण कोई एक ही वरिष्ठ स्थान पाता है। शेष सभी उसके नीचे रहते हैं, किंतु जो नीचे हैं उन्हें अपने आप को हेय नहीं मानना चाहिए; क्योंकि सृष्टि परिवर्तनशील है। इसमें अपने संस्कारों की परिणति के फलस्वरूप कौन, कब, कहाँ चला जाएगा इसका कोई ठिकाना नहीं। इसलिए बुद्धिमान जन पद की न्यूनाधिकता से विचलित नहीं होते।"


(अखण्ड ज्योति से साभार)