ज्योतिष में विपरीत राजयोग!


सामान्यतः जन्मपत्री में शुभ घरों में- लग्न, चतुर्थ, पंचम, नवम या दशम भाव के स्वामी बली हों तो धनदायक योग बन जाता है, लेकिन कुछ कुंडलियों में ऐसा नहीं होने पर भी व्यक्ति धनवान होता है। इसके लिए विपरीत राजयोग उत्तरदायी हो सकता है।


शुभ ग्रहों के बली होने से धन प्राप्ति होगी ये सभी जानते हैं, परन्तु अशुभ भावों (त्रिक 6,8,12) के स्वामी यदि निर्बल और पाप प्रभाव में हों तो भी जातक के लिए धनदायक होते हैं। कुंडली में छठा, आठवां और बारहवां स्थान त्रिक भाव कहलाता है। यदि त्रिक स्थानों का स्वामी ग्रह इन्हीं से छठे, आठवें या बारहवें भाव में बैठ जाए तो वह निर्बल होकर धनदायक हो जाएगा। छठा भाव ऋण का है। इस स्थान का स्वामी ग्रह इससे छठे घर में बैठ जाए तो व्यक्ति को ऋण से मुक्ति दिलाने वाला बन जाता है। इसी प्रकार जन्म पत्रिका में तीसरा और ग्यारवां स्थान भी श्रीदायक स्थान है। इनके स्वामी भी यदि इनसे तीसरे, ग्यारहवें में स्थित होंगे तो शुभफल देंगे। ज्योतिष में इसे विपरीत राजयोग की संज्ञा दी गई है। । उदाहरण स्वरूप दी गई जन्मपत्रिका में बुध तृतीयेश और षष्ठेश होकर अतीव पापी दिखाई देता है, परन्तु यह तीसरे स्थान से छठे में, और छठे से तीसरे बैठ कर उन पाप भावों की हानि कर रहा है। साथ ही उस पर केतु की दृष्टि और पाप प्रभाव होने के कारण वह निर्बल हो चुका है। इसलिए बुध शुभ और धनदायक हो गया है.


यह विपरीत राजयोग का एक अच्छा उदाहरण है।