अब ये मत पूछने लगना, वह पर्वत कहाँ हैं, जिसे हनुमान जी ने उठाया था!!


जीवन एक युद्ध ही तो है। मानव युद्ध से डरता है यह युद्ध ऐसी जालिम चीज है कि इससे बचा नहीं जा सकता। खुद भगवान राम को युद्ध का सामना करना पड़ा। अपने अधिकारों के लिए युद्ध जीतना जरूरी है। यह बात अलग है कि राम-रावण युद्ध तय था । उदाहरणीय बनने के लिए खुद भगवान ने इंसान के रूप में बहुत कुछ निभाया है। अधर्म पर धर्म की जीत इसी की एक कड़ी है। केवल एक बुरा पन्ना पूरी किताब के सार को नष्ट कर डालता है। रावण कितना भी विद्वान और ज्ञानवान क्यों न हो, लेकिन एक महिला का अपहरण उसे किस श्रेणी में खड़ा करता है कि आज तक उसका पुतला फूंका जा रहा है।


बात फिर युद्ध की ही करते हैं। युद्ध में उतार-चढ़ाव आता रहता है। लक्ष्मण मूर्च्छित हो गए। पूरी वानर सेना परेशान हो गई, परंतु राम इस मुसीबत के दौर में घबराए नहीं। हनुमान जी ने जो पहल की और जिस तरह अपना कर्त्तव्य निभाया वह एक मिसाल है । बुरा वक्त टल गया वानर सेना फिर खड़ी हुई और रावण को पछाड़ दिया।


श्रीराम जन-जन की एक आस्था हैं। श्रीराम सेतु उससे भी बड़ी आस्था । अब नास्तिक तो हर जमाने में रहे हैं, कल कोई सिरफिरा कहीं उस पर्वत का प्रमाण न मांग ले, जिसे हनुमान जी ने संजीवनी समेत उठाया था। श्रीराम के प्रति परीक्षा का यह दौर भी निकल जाएगा। श्रीराम के प्रति आस्था हमेशा-हमेशा बनी रहेगी।


दरअसल हमारे इसी देश में श्रीराम के वजूद को लेकर सवाळ खडे किए जा रहे हैं । श्रीराम सेतु के बारे में प्रमाण ढूंढे जा रहे हैं। विज्ञान कितना भी बड़ा क्यों ने हो जाए, उसका मानवीय आस्था से कभी सामंजस्य स्थापित नहीं हो सकता। जो लोग श्रीराम के वजूद को लेकर प्रश्न उठाते हैं, उन लोगों से पूछा जाना चाहिए कि आप विधायक, सांसद और मंत्री बनने पर फिर ईश्वर के नाम पर सौगंध क्यों खाते हैं। आप श्रीराम जी के गुणों के चलते अपना नाम करुणानिधि रख सकते हैं, परंतु श्रीराम का अस्तित्व पूछते हैं। यह सब प्रमाणित करता है कि धर्म में राजनीति भले ही चलती है, परंतु उसमें केवल अपने हित ही नहीं देखने चाहिए। जब आदमी अपने हितों को देखता है तो उसकी सियासत उजागर हो जाती है। दुख इस बात का है कि कई राजनीति के लोग अपनी इसी कोशिश में विवेक खो चुके हैं और जब-जब विवेक खत्म होगा, अधर्म पैदा होगा और यह बात हर कोई जानता कि अधर्म पर हमेशा धर्म की जीत होती है।