अभी तो मैं जवान हूँ !

 



युवा का रिश्ता मन से होता है, शरीर से नहीं। शरीर वृद्ध होता है, मन नहीं। कोई व्यक्ति वृद्ध होकर भी युवक सरीखा सक्रिय हो सकता है और कोई युवक होकर भी वृद्ध सरीखा हो सकता है। एक छोटी सी घटना है। एक बार एक स्वामी जापान की यात्रा पर थे। जहाज की डेक पर एक जापानी वृद्ध बैठा चीनी भाषा सीखने में व्यस्त था। स्वामी जी उसे बार-बार देख रहे थे। अंत में उन्होंने उस नब्बे वर्षीय बूढ़े से सवाल कर दिया कि इस उम्र में चीनी भाषा सीखकर आप क्या करेंगे? अब तो अंतिम पड़ाव पर है। आखिर इसका उपयोग कब करेंगे? जापानी वृद्ध ने स्वामी जी को घूरते हुए कहा कि तुम जरूर भारतीय हो। भारत में जीवन की दो ही अवस्थाएं होती हैं। बचपन और बुढ़ापा। बीच में जवानी गायब। तुम भारतीय बचपन से सीधे बुढ़ापे पर आ जाते हो। तभी ऐसा प्रश्न कर रहे हो। जो निरंतर आगे देखता है वही युवा है।
पीछे की तरफ देखने वाला और स्मृतियों की भूल भुलैया में उलझने वाला मन युवा नहीं है। युवा मन वह है जो नई योजनाओं में अपनी सारी शक्ति केन्द्रित करता है और जीवन को प्रति पल ऊर्जा से भरता रहता है। यदि जीवन में समस्याएं आती हैं तो बूढ़ा मन कहेगा कि पलायन कर जाओ, परन्तु युवा मन का दृष्टिकोण इससे उलट होगा। जिंदगी तो समस्याओं की एक श्रृंखला है। समस्याओं पर विलाप नहीं करना है। सावधानी से उनका विश्लेषण करते ही अपनी गलती पकड़ में आने लगेगी। गलती दूर करते ही समस्याएं सुलझने लगेगी।
बेंजामिन फ्रैंकलिन कहते हैं कि जो बातें हमें पीड़ा पहुंचाती हैं वे साहस के सृजन के साथ-साथ कुछ सिखाती भी हैं। सफलता के शहद के स्वाद को चखने के लिए बाधाओं के इंक की पीड़ा सहनी होगी। युवा को पृथ्वी के दिव्यांतरण की दिशा में अग्रसर होना पड़ेगा। बूढ़ा मन ही बासी परंपरा के चक्कर में पड़कर वर्तमान जीवन का निषेध करता है, जिन्होंने इस जीवन को भरपूर नहीं संवारा है वे इसके पार के जीवन का निर्माण कैसे कर सकेंगे? युवा होना हर क्षण खतरे में जीना है और वृद्ध होना सुरक्षा की तलाश में भटकना है। जो तलवार खतरों से युद्ध करने से कतराती है, उसकी धार म्यान में पड़े-पड़े कुद पड़ जाती है। दुर्भाग्य है कि आज का युवा खतरे में जीना नहीं चाहता। 


    -संकलन-संजय कुमार गर्ग