दुःख, कष्ट और अभावों से कैसे बचें!


प्रजापति ब्रह्मा जी ने मनुष्य को उत्पन्न किया। मनुष्य ने अपना सारा जीवन दुःख, कष्ट और अभावों से घिरा देखा तो उसने पितामह विधाता से शिकायत की- “भगवन्! इस संसार में असहाय छोड़े गए हम मनुष्यों की रक्षा और पोषण कौन करेगा?" पितामह बोले-"यज्ञ तात्! यज्ञ द्वारा तुम देवताओं को आहुतियाँ प्रदान करना, संतुष्ट हुए देवता तुम्हें धन, संपत्ति, बल और ऐश्वर्य से भर देंगे।" और सच ही जब तक यह देश यज्ञ करता रहा धन-धान्य की कमी नहीं रही।


जीवन में यज्ञीय आस्थाएँ और समाज में यज्ञीय परंपरा प्रतिष्ठापना के लिए आवश्यक सभी सूत्र यज्ञ के तत्त्वज्ञान में बीज रूप में मौजूद हैं। धर्म परंपराओं के आधार पर प्रगतिशीलता का प्रशिक्षण करने की प्रक्रिया कितनी हृदयग्राही और कितनी सफल हो सकती है, इसका अनुभव प्राचीनकाल की तरह ही इन दिनों भी किया जा सकता है।


यज्ञकृत्य के अंतर्गत कितने ही छोटे-छोटे विधि-विधान आते हैं। इन सबके पीछे वे सभी दृष्टिकोण सन्निहित हैं, जिन्हें अपनाने से व्यक्ति और समाज का, नवयुग का उत्कृष्टता संपन्न ढाँचा खड़ा किया जाता है। उन सभी कृत्यों में प्रयुक्त होने वाले मंत्रों की, विधि-विधानों की साथ-साथ व्याख्या से बहुमुखी लोक-शिक्षण की उच्चस्तरीय आवश्यकता भली प्रकार पूरी होती रह सकती है। यज्ञाग्नि के रूप में युगक्रांति की प्राणवान प्रतिमा की स्थापना-अभ्यर्थना का भावभरा उपक्रम ऐसा है, जिसके सहारे जनभावना को अवांछनीयता के उन्मूलन एवं शालीनता के पुनर्जीवन के लिए उभारा और जुटाया जा सकता है।


-अखण्ड ज्योति से साभार